"बस तू ही है — मेरी कहानी"
एक समय की बात है, एक लड़की थी — शांत, समझदार, पर भीतर से टूटी हुई। ज़िंदगी में बहुत कुछ था, पर कोई "अपना" नहीं था, जिससे वो सिर रखकर बस कुछ पल सुकून पा सके।
पिता हमेशा कहते,
"उसे बोलो चिंता मत करे, मैं हूँ न।"
पर यह 'मैं हूँ न' सिर्फ लफ्ज़ थे, एहसास नहीं।
उसने कभी अपने पिता की गोद को सिरहाना नहीं बनाया,
बचपन से हर बात माँ से की,
पर एक खालीपन था — जिसे कोई भर नहीं पाया।
और तभी उसकी ज़िंदगी में वो आया।
ना कोई शोर, ना कोई वादा... बस धीरे-धीरे वो साथ बन गया।
ना दिखावे वाला, ना हर वक़्त साथ रहने की ज़िद करने वाला,
पर हमेशा पास होने का एहसास देने वाला।
वो कहता:
"तू पीछे मुड़ कर देख, मैं हमेशा वहीं हूँ।"
"प्यार सिर्फ कहना नहीं होता, निभाना होता है।"
दूरी बढ़ी, हालात बदले,
बातें कम हो गईं, लेकिन एहसास नहीं।
एक महीना बीत गया,
ना मुलाकात, ना लंबी बातें —
पर जब भी आंखें बंद कीं,
उसका साथ महसूस हुआ।
और फिर उसने खुद से कहा:
"अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए,
क्योंकि वो —
वो ही 'मेरा' है,
वो ही 'मेरे सब कुछ' है,
अब बस — वो ही है,
बस... वो ही है।"